जब बना था पहला एंटीबायोटिक दवा : कुछ रोचक बातें

 


 जब बना था पहला एंटीबायोटिक दवा : कुछ रोचक बातें  

क्या आपने कभी सोचा है कि कोई दवा क्यों खोजी जाती है ? कि सिर्फ इंसानों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए या दुनिया भर में पड़े सैकड़ो वर्षों के अनसुलझे रहस्य को सुलझाने ऐसी कई बातों को लेकर आज बात किया जाएगा 

यह संसार कार्य- कारण का सिलसिला है दिलचस्प बात यह है कि कार्य न तो मनुष्य पर निर्भर करता और नहीं कारण पर |



मनुष्य खूब ताले लगा लेता है, काम बंद करके घर चला जाता है या इसके उलट घर बंद करके वह काम पर चला जाता है लेकिन क्या उसके ऐसा करने से उसके पीछे घर या दफ्तर में काम बंद हो जाता है कतई नहीं |

इसी तरह ब्रिटेन की एक प्रयोगशाला महीने भर से बंद पड़ी थी लेकिन उसके अंदर जो पूरी प्रक्रिया हो रही थी वह ही सबसे हैरान करने वाली थी इस प्रयोगशाला में रखी एक जार का पात्र जो कई महीने से एक ही स्थान पर पड़ी थी उसमें परत दर परत जंग लगने की प्रक्रिया चल रही थी और इस पात्र पर असंख्य योद्धा मैदान में उतरे हुए थे योद्धा दो सेनाओं में बटे हुए थे 



एक तरफ माइक्रोब्स ( virus ) की सेना वार के लिए तैयार और दूसरी तरफ  फफूंद (mold ) की भी सेना धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी और सबसे बड़ी बात की दोनों सेनाये एक दुसरे के खून की प्यासी थी 

उनके लिए तो जैसे पल-पल जीना,  पल पल लड़ना था ,पल भर के लिए लड़ो,  नहीं तो मरो लेकिन मरना कौन चाहता है जीने के लिए ही तो ही युद्ध लड़ रहे इंसान,  जानवर , virus सभी |



उस पात्र में सबसे पहले virus का कब्जा था अगर मनुष्य के नजरिया से देखा जाए तो यह खतरनाक था किसी शरीर में लगी चोट जो गहरी हो गई हो उसमें बड़ी से बड़ी मवाद ( pus ) पैदा करने में इस माइक्रोब्स का ही हाथ होता है तब तक संसार में उन्हें यह अहंकार होगा कि उनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता एक बार अगर गलती से किसी को कोई चोट लग जाए तो यह virus अपना जौहर दिखाने मैदान में उतर आते हैं 

और इसके बाद माइक्रोब्स आतंकवादियों ने जंग के मैदान और घायलों से भरे कई अस्पताल वीरान हो जाते हैं



इंसान की तरह ही ये वायरस भी कमजोरों को ही हमेशा सताते आते रहे हैं और इसके बाद तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक उनके आगे घुटने टेक देते हैं लेकिन कुदरत का कमाल देखिये कि बंद प्रयोगशाला में पड़ी उस पात्र पर सेनाये मुकाबले के लिए जुटी है इस युद्ध में माइक्रोब्स हार की ओर तो फफुद वीरता साबित करने की ओर हर ईट का जवाब पत्थर से दे रहे है 

बेशक रोगाणु और जीवाणु के बीच ऐसी भयानक जंग हमेशा होती रही होगी पर 3 सितंबर 1928 का दिन बेमिसाल है उसी ब्रिटेन के प्रयोगशाला के मालिक और वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने बंद ताले को तोड़ा और अंदर आया 



और प्रयोगशाला में कुछ हरी चीज और कुछ चमकीली चीजों ने उनका ध्यान अपनी और खींचा प्रयोगशाला में मौजूद लगभग सभी पात्रो में ऐसा ही नजारा था लगभग महीने भर की छुट्टी से लौटे फ्लेमिंग को आश्चर्य हुआ कि क्या अजीब बन गई है ? 

पहले तो मन में आया कि पूरा लैब तो खराब हो गया और इन पात्रो को निकाल कर बाहर फेंक देते हैं लेकिन फिर वैज्ञानिक बुद्धि जागी की फेंकने से पहले एक बार माइक्रोस्कोप से देख तो ले कुछ नहीं होगा काम का तो कम से कम तजुर्बा (एक्सपीरियंस ) तो मिलेगा और इस तरह से जब फ्लेमिंग ने इसको चेक किया तो पहले तो हैरान यह क्या हो रहा है इतनी तेजी से प्रक्रिया उसके बाद कार्य से कारण और मतलब से मतलब जोड़ते गए

जांच और रुचि बढ़ती गई और फ्लेमिंग जख्मो से फैलने वाले संक्रमण का इलाज खोजने में पहले से ही लगे थे उसी के बारे में कुछ जानकारी लेने के लिए दूसरे देश गए हुए थे 

सबसे बड़ी बात ये भी थी कि उन्हें यह पहले से ही पता था कि किसी भी घाव में संक्रमण वायरस के कारण ही फैलता है और अब उन्हें लगने लगा था कि फफुद में ही कुछ ऐसा है जो बैक्टीरिया का काम तमाम कर सकता है और संसार का एक प्राकृतिक पहलू समझ गए 



विषाणु ( virus )  हमला करते हैं तो शरीर के जीवाणु ( bactoria ) मुकाबला करते हैं और आधे से ज्यादा को जीवाणु आसानी से ठिकाने लगा देते हैं लेकिन कुछ virus ऐसे भी होते है जिन्हें बैक्टीरिया नहीं मार पाते है तब ही जरुरत होती है की बाहर से मदद किया जाये तब यही मदद दवा के रूप में होती है और फ्लेमिंग को ये बात सच लगने लगी थी की आमतौर पर पुरानी रखी ब्रेड का टुकडे पर लगने वाले फफुद से ही संक्रमण के खिलाफ रामबाण दवा बन सकती है 

रोचक बात ये भी थी virus भी एक सीरीज बनाकर लड़ते है और बैक्टीरिया की भी यही अंदाज है की वो एक साथ इसका मुकाबला करते है लेकिन हम इंसानों का अलग ही नियम हम जब किसी से लड़ते है तो अकेले अकेले ही चाहे हो धर्म की बात हो जातीय मुद्दा या कोई समाजिक मुद्दा ही क्यों न हो 

और यह बात किसी से छिपी नहीं है की इंसान भी तभी जीतता है जब वह क्रमबद्ध या एक जुट होकर लड़ता है फ्लेमिंग पेनसिलिन जैसी महान दवा तक पहुच गए लेकिन इसे सहज में उपयोग लायक बनाने में भी वैज्ञनिको की एकजुटता ही काम आई 



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