UPSC संस्था में भी क्या हिन्दू मुस्लिम चलता है ?

 




UPSC संस्था  में भी क्या हिन्दू मुस्लिम चलता है ?

हिंदी के कवि  गोपाल दास ने कविता लिखी थी

 "कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता "

यह कविता जिंदगी की कविता है उम्मीद की कविता है भरोसा जगाने की कविता है प्रेम उगाने की कविता है लेकिन प्रेम और विश्वास को कौन कहे यह एक ऐसा समय है जब नफरत ही नफरत उगाई जा रही है कहीं जात के नाम पर ,कहीं धर्म के नाम पर ,कहीं नस्ल के नाम पर

 पर कौन नहीं जानता है कि नफरतों से निर्माण नहीं बल्कि विध्वंश ही होता है और हुआ ही है और हो भी रहा और आगे भी होता रहेगा लेकिन हम इसे अपरिपक्वता कहें साजिश कहे या फिर राजनीति स्वार्थ जो हमारे देश में एक ऐसा  समुदाय में उभर कर आ रहा है जो सोशल मीडिया को ही अपना हथियार बना लिया है हैरानी तो तब जाकर हुआ जब एक ऐसी संस्था पर आरोप लगाया गया जिस पर आज भी विश्वास सच्चाई या यू कहे कि सरकार से भी अधिक विश्वास संघ लोक सेवा आयोग जिसे हम UPSC के नाम से जानते हैं पिछले 30 से 40 वर्षों से या इसे आप इस प्रकार से भी मान सकते हैं कि जब से राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों की सरकार बननी शुरू हुई है तभी से समाजवाद दलितवाद या और कई नाम से जानते हैं कई जगहों पर जैसे व्हाट्सएप फेसबुक ट्विटर पर देखा गया कि #UPSC जिहाद जैसे अलग-अलग नाम से भ्रम फैलाया जा रहा है साफ और स्पष्ट शब्दों में कहा जा रहा है की  यूपीएससी के एग्जाम में मुसलमानो को सरकार अधिक प्राथमिकता दे रही है कई बार तो ये भी लिखा गया है की यूपीएससी के एग्जाम में मुसलमानो को 9 बार मौका तो वही हिंदुओं को 6 बार ही क्यों अवसर दिया जा रहा है ?

इसी तरह उम्र को लेकर भी सवाल उठ रहा है की मुसलमानो के लिए 35 वर्ष तक तो फिर हिंदुओं के लिए 32 वर्ष तक ही क्यों ?

इतनी बात पर विवाद क्या काम था की अब ये सवाल उठने लगा की इस्लामिक शिक्षा के जरिए मुसलमानो के IAS/PCS बनने का अवसर दिया जा रहा है जबकि हिंदुओं के लिए वैदिक या हिंदू विषय जैसा कोई सब्जेक्ट ही नहीं है इस लिस्ट में ।

इन सभी प्रश्नों में कितनी सच्चाई है इस पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन इसे पहले हमे ये भी जानकारी होनी चाहिए की UPSC है क्या ?

UPSC ? भारत देश को सबसे विश्वसनीय परीक्षा कराने वाली संस्था जिसके माध्यम से IAS/PCS/IRS/IFS के साथ ही कई और विभागो में बच्चो का चयन होता है जिसमे संप्रदाय , रंगभेद का कोई जगह नही है प्रति वर्ष होने वाले इस एग्जाम के नियम कानून विस्तार से प्रकाशित होते है जैसे योग्यता , आरक्षण , एग्जाम देने से पहले न्यूनतम और अधिकतम उम्र , विषयों की जानकारी लेकिन इसके बाद भी लगातार यूपीएससी से सफाई मांगा जा रहा है लेकिन अभी तक न तो यूपीएससी और न ही सरकार ने कोई जवाब दिया है लेकिन जब आंकड़े पर नजर डाले गए तो बाते इस प्रकार सामने आ रही है 

समस्या और समाधान : सबसे पहले जानते है की कौन IAS और PCS बन सकता है ? तो यूपीएससी के हर बार के नोटिफिकेशन में एक ही बात कहा जाता है की आप भारतीय नागरिक हो न की आप इस धर्म , इस जाति, इस नस्ल ऐसा कोई भी शब्द यूज ही नही होता है |

उम्र की समस्या : 

इस एग्जाम को देने के लिए न्यूनतम उम्र 21 वर्ष तो वही अधिकतम उम्र 32 वर्ष । लेकिन इसके बाद भी यूपीएससी संस्था ने अनुसूचित जाति /अनुसूचित जनजाति /अन्य पिछड़ा वर्ग / शारीरिक रूप से असमर्थ और पूर्व सैन्य कर्मियो को इस उम्र सीमा में छूट दी गई है जो इस प्रकार है

 SC/ST : 37 वर्ष अधिकतम 

  • ओबीसी : 36 वर्ष अधिकतम 
  • PH : 42 वर्ष अधिकतम 

और इसके अलावा सभी वर्गों ,समुदायों को केवल 6 बार  ही अवसर दिया जाता है तो ऐसे में मुसलमान कहां से यूपीएससी का फायदा उठा रहे हैं जिस प्रकार से खबरें फैलाई जा रही है फैलानी है तो कुछ अच्छा फैलाओ 

सब्जेक्ट प्रॉब्लम :

इस पर ही सबसे अधिक विवाद हुआ है और हो भी रहा जैसे कहा गया कि मुसलमान को इस्लामी विषय  के आधार पर अवसर दिया जा रहा है जिसके कारण से इनका सिलेक्शन सबसे अधिक हो रहा है जबकि सच्चाई तो यह है कि यूपीएससी के मुख्य परीक्षा के 26 ऑप्शनल सब्जेक्ट में इस्लामी विषय जैसा कोई भी सब्जेक्ट नहीं है तो वही ग्रेजुएशन होना सभी के लिए अनिवार्य है इस पूरी बात में कहीं पर भी हिंदू या मुसलमान शब्द का यूज नहीं किया गया है तो फिर भी विवाद  करने का कोई अर्थ नहीं बनता है 

अवसर की समस्या : मुसलमानों को 9 अवसर क्यों जबकि हिंदू को 6  बार एग्जाम देने को मिल रहा ?

 लेकिन सच्चाई तो यह है कि यूपीएससी के नोटिफिकेशन में हर बार यही कहा जाता है की  SC/ST/PH के लिए एग्जाम देने के लिए कोई भी लिमिट नही है अर्थात 21 वर्ष से शुरू करिए और 37 वर्ष की उम्र तक एग्जाम देते रहिए 9 की बात छोड़िए यहां तो 18 बार मौका मिल रहा है अब ये तो है हिंदू ही तो ...

और न ही हिंदू विषय है यूपीएससी के एग्जाम दे चुके दोस्तों से भी बात करने का मौका मिला उनका भी जवाब था कि ऐसा कोई भी सब्जेक्ट नहीं है हां उर्दू साहित्य का सब्जेक्ट जरूर है लेकिन इस सब्जेक्ट से केवल साहित्य से जुड़े ही प्रश्न पूछे जाते हैं

 कुछ आंकड़ों पर नजर डाला जाए आईएएस को ट्रेनिंग देने वाली सेंटर  लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में पिछले वर्ष कुल 326 लोग थे जिसमें उर्दू विषय के एक भी लोग नहीं थे इंग्लिश मीडियम के 315 हिंदी के 8 मराठी गुजराती और कन्नड़ के एक-एक छात्र थे यही नहीं इसके भी पहले के आंकड़े 2016,  2017,  2018 में भी उर्दू माध्यमों से सेलेक्ट हुए छात्रों की संख्या नाम मात्र ही मिली है 

जैसे:-  2017 में उर्दू से 26,  हिंदी से 265,  मलयालम से 111, तमिल से 106, कन्नड़ से 114 

वही 2018 में उर्दू विषय को केवल 16 ही छात्रों ने चुना है एक सच्चाई तो यह भी है कि पिछले 10 वर्षों में सबसे अधिक स्टूडेंट संस्कृत साहित्य से सेलेक्ट हुए हैं और अभी भी हो रहे हैं विवाद तो तब अधिक बढ़ गया  जब   

2016 में 28,

2017 में 50,

2018 में 52,

2019 में 42 

मुस्लिम छात्रों का चयन  यूपीएससी में हो गया इस पर विवाद   करने और अपने विचार रखने वाले लोग जान ले कि यह संख्या एग्जाम में पास हुए कुल छात्रों के 5% के करीब है जबकि देश भर में मुसलमान की जनसंख्या 15 से 20% हो गई है  चयनित हुए लोगों की संख्या बढ़ इसलिए भी सकती है क्योंकि सामाजिक और अधिकारिता मंत्रालय ने एससी-एसटी और पिछले वर्गों के लिए अपनी पसंद के कोचिंग सेंटर को चयन करने की  सुविधा प्रदान कर रखी है जिसमें पैसा भी मंत्रालय देखा और स्कॉलरशिप भी दिया जाएगा 

ऐसे में यह सवाल खड़ा करना पूरी तरह से गलत है कि यूपीएससी भी धर्म ,जाति , लिंग के साथ भेदभाव करता है सरकार कर सकती हैं लेकिन यूपीएससी नहीं | 

ऐसे में फैलाई जा रही फर्जी खबरों को तुरंत रोका जाए चाहे कोई न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया यहां तक कि अगर कोई नेता भी  ऐसे फर्जी बयान देने की कोशिश कर रहा है तो उसे पर कठोर कार्रवाई की जाए क्योंकि अगर बात आगे तक बढ़ती है तो सबसे अधिक धक्का यूपीएससी को लगेगा ना कि सरकार को  ...


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